Warkari Palkhi 2026: भक्ति और मानवता का अनूठा संगम, स्मृति ईरानी ने साझा की पुणे की पावन वारकरी

Warkari Palkhi 2026: भक्ति और मानवता का अनूठा संगम, स्मृति ईरानी ने साझा की पुणे की पावन वारकरी


Warkari Palkhi 2026: आषाढ़ का महीना शुरू होते ही महाराष्ट्र की धरती ‘विठ्ठल-विठ्ठल’ के जयकारों से गूंज उठी है. सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा ‘वारकरी पालकी यात्रा’ इन दिनों पूरे उत्साह के साथ निकाली जा रही है. लाखों भक्तों की भारी भीड़ भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर की ओर बढ़ रही है. 

भक्ति के इस बड़े उत्सव की एक सुंदर झलक भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सीनियर नेता स्मृति ईरानी ने सोशल मीडिया पर शेयर की है, जिसे देशभर के लोग बहुत पसंद कर रहे हैं.

‘भक्ति और इंसानियत एक दूसरे से जुड़े हैं’

पुणे से गुजर रही इस भव्य पालकी यात्रा का एक वीडियो शेयर करते हुए स्मृति ईरानी ने इसके महत्व को बताया. उन्होंने इस पवित्र नजारे के साथ एक गहरा संदेश देते हुए लिखा:
‘भगवान पर भरोसा या आस्था तब सबसे सुंदर रूप लेती है, जब हम इंसानों की सेवा करते हैं…’

Faith finds its highest expression in the service of humanity… 🤍

📍Warkaris’ Palkhi Procession, Pune pic.twitter.com/TY4Ul6U5v4

— Smriti Z Irani (@smritiirani) July 12, 2026

स्मृति ईरानी का यह संदेश इस बात की ओर इशारा करता है कि ईश्वर की सच्ची भक्ति केवल कर्मकांडों में नहीं, बल्कि समाज और मानवता की निस्वार्थ सेवा में निहित है.

भक्ति रस में डूबा सोशल मीडिया

12 जुलाई को पोस्ट किए गए इस पावन वीडियो को अब तक 1.34 लाख से अधिक सनातन धर्मावलंबी और सोशल मीडिया यूजर्स देख चुके हैं. वीडियो में संतों की पालकी के पीछे चलता हुआ अनुशासित जनसैलाब और उनके हाथों में लहराती भगवा पताकाएं (ध्वज) देखकर लोग इसे आध्यात्मिक रूप से बेहद प्रेरणादायक बता रहे हैं.

वारकरी परंपरा का धार्मिक महत्व क्या है?

भगवान से मिलन: यह यात्रा सिर्फ पैदल चलना नहीं है, बल्कि भक्त का भगवान (विठ्ठल) से मिलने का एक जरिया है. भक्त संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत तुकाराम महाराज की पादुकाओं (चरण पादुका) को पालकी में रखकर पंढरपुर ले जाते हैं.

घमंड को दूर करना: इस यात्रा में शामिल होने वाले लोग (जिन्हें वारकरी कहा जाता है) तुलसी की माला पहनते हैं, माथे पर चंदन का तिलक लगाते हैं और ढोल-मंजीरों की थाप पर ‘ज्ञानबा-तुकाराम’ गाते हुए चलते हैं. माना जाता है कि सैकड़ों किलोमीटर की यह पैदल यात्रा इंसान के अंदर से घमंड को खत्म कर देती है.

सब एक समान: जानकारों के मुताबिक, यह परंपरा समाज से जात-पात के भेदभाव को मिटाकर सबको एक साथ लाने और ‘पूरी दुनिया एक परिवार है’ की भावना को सच करती है.

यात्रा क्यों निकाली जाती है?

विठ्ठल भक्ति: आषाढ़ी एकादशी के दिन भगवान विठ्ठल (जो श्री कृष्ण का ही रूप हैं) के दर्शन करने और उनके प्रति अपना प्यार जताने के लिए.
संतों का सम्मान: संतों के अच्छे विचारों और उनकी सीख को समाज में जिंदा रखने के लिए.
समानता का संदेश: समाज से ऊंच-नीच का फर्क मिटाकर भाईचारा बढ़ाने के लिए.

आषाढ़ी एकादशी के पवित्र मौके पर यह सभी पालकी यात्राएं पंढरपुर पहुंचेंगी. वहां चंद्रभागा नदी में नहाने के बाद लाखों भक्त भगवान विठ्ठल के चरणों में सिर झुकाकर आशीर्वाद लेंगे.

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