शिव के गले में कौन सा विष है? क्या आप जानते हैं इसका नाम

शिव के गले में कौन सा विष है? क्या आप जानते हैं इसका नाम


देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए क्षीर सागर का मंथन शुरू किया. मंदराचल पर्वत मथानी बना और नागराज वासुकी रस्सी. तभी समुद्र से भयंकर हलाहल विष प्रकट हुआ. उसकी ज्वालाओं और जहरीले धुएं ने तीनों लोकों को घेर लिया. चारों ओर भय, अफरा-तफरी और विनाश का माहौल बन गया. पूरी सृष्टि संकट में पड़ गई.

हलाहल विष की भयानक तपिश से देवता और असुर घबरा उठे. कोई भी उस विष को रोकने में सक्षम नहीं था. सभी कैलाश पहुंचे, जहां भगवान शिव गहरी समाधि में लीन थे. हाथ जोड़कर उन्होंने विनती की,

हलाहल विष की भयानक तपिश से देवता और असुर घबरा उठे. कोई भी उस विष को रोकने में सक्षम नहीं था. सभी कैलाश पहुंचे, जहां भगवान शिव गहरी समाधि में लीन थे. हाथ जोड़कर उन्होंने विनती की, “प्रभु, इस महाविनाश से संसार की रक्षा केवल आप ही कर सकते हैं.” हर ओर बस एक ही उम्मीद थी महादेव.

सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने बिना एक पल सोचे हलाहल विष अपने हाथों में उठाया. उन्होंने शांत मन और अडिग साहस के साथ उसे पी लिया. उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि समस्त संसार के प्रति करुणा और त्याग का तेज झलक रहा था. यही उनका सबसे महान बलिदान बना.

सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने बिना एक पल सोचे हलाहल विष अपने हाथों में उठाया. उन्होंने शांत मन और अडिग साहस के साथ उसे पी लिया. उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि समस्त संसार के प्रति करुणा और त्याग का तेज झलक रहा था. यही उनका सबसे महान बलिदान बना.

जब हलाहल विष शिव जी के शरीर में उतरने लगा, तब माता पार्वती चिंतित हो उठीं. उन्होंने तुरंत अपने हाथों से महादेव का कंठ थाम लिया, ताकि विष पेट तक न पहुंचे. उनकी दिव्य शक्ति से विष गले में ही रुक गया. यह क्षण माता पार्वती के प्रेम, साहस और संरक्षण का अद्भुत प्रतीक बन गया.

जब हलाहल विष शिव जी के शरीर में उतरने लगा, तब माता पार्वती चिंतित हो उठीं. उन्होंने तुरंत अपने हाथों से महादेव का कंठ थाम लिया, ताकि विष पेट तक न पहुंचे. उनकी दिव्य शक्ति से विष गले में ही रुक गया. यह क्षण माता पार्वती के प्रेम, साहस और संरक्षण का अद्भुत प्रतीक बन गया.

हलाहल विष गले में रुकने के कारण भगवान शिव का कंठ गहरे नीले रंग का हो गया. तभी से उन्हें 'नीलकंठ' के नाम से पूजा जाने लगा. महादेव शांत भाव से ध्यान में लीन रहे. उनका नीला कंठ त्याग, धैर्य और संसार की रक्षा के लिए किए गए सर्वोच्च बलिदान का अमर प्रतीक बन गया.

हलाहल विष गले में रुकने के कारण भगवान शिव का कंठ गहरे नीले रंग का हो गया. तभी से उन्हें ‘नीलकंठ’ के नाम से पूजा जाने लगा. महादेव शांत भाव से ध्यान में लीन रहे. उनका नीला कंठ त्याग, धैर्य और संसार की रक्षा के लिए किए गए सर्वोच्च बलिदान का अमर प्रतीक बन गया.

हलाहल विष की तीव्र जलन शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर शीतल जल और दूध अर्पित किया. महादेव ने मस्तक पर चंद्रमा धारण किया और जटाओं में मां गंगा को स्थान दिया. तभी से भक्त जल, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाकर नीलकंठ महादेव के त्याग, करुणा और दिव्य महिमा का स्मरण करते हैं.

हलाहल विष की तीव्र जलन शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर शीतल जल और दूध अर्पित किया. महादेव ने मस्तक पर चंद्रमा धारण किया और जटाओं में मां गंगा को स्थान दिया. तभी से भक्त जल, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाकर नीलकंठ महादेव के त्याग, करुणा और दिव्य महिमा का स्मरण करते हैं.

Published at : 12 Jul 2026 09:55 AM (IST)

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