Chaturmas 2026: जुलाई में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि तमाम मांगलिक कार्य के लिए कम ही मुहूर्त है, क्योंकि 25 जुलाई से चातुर्मास लग रहे हैं इसके बाद शुभ कार्य 4 महीने तक बंद हो जाते हैं, हालांकि पंचांग अनुसार इस बार चातुर्मास लगने से पहले ही यानी 12 जुलाई के बाद शुभ कार्य के मुहूर्त नहीं है क्योंकि बृहस्पति वार्धक्य अवस्था में प्रवेश करेंगे, क्या है बृहस्पति की वार्धक्य अवस्था, इसके क्या प्रभाव पड़ते हैं जानते हैं.
12 जुलाई से क्यों बंद होंगे शुभ कार्य
12 जुलाई को सुबह 11 बजकर 11 मिनट से बृहस्पति ग्रह वार्धक्य अवस्था में प्रवेश करेंगे. इसके बाद शुभ कार्य करने पर उसमें सफलता मिलने की संभावना मुश्किल होती है.
वार्धक्य अवस्था क्या होती है ?
वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की बाल्य, कुमार, युवा और वार्धक्य जैसी अवस्थाओं का वर्णन मिलता है. इन अवस्थाओं के आधार पर ग्रह की शक्ति और फल देने की क्षमता का आकलन किया जाता है. जो ग्रह वार्धक्य अवस्था में होता है. उससे संबंधित कार्यों में विलंब या अधिक प्रयास की आवश्यकता पड़ सकती है
बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, संतान, विवाह, गुरु, भाग्य, धन, उच्च शिक्षा और शुभ कार्यों का कारक ग्रह माना जाता है. वार्धक्य अवस्था में आने पर बृहस्पति की ऊर्जा परिपक्व तो रहती है लेकिन उसके शुभ फलों की गति और प्रभाव में कुछ कमी आ जाती है यानी जिस तरह वृद्ध व्यक्ति अनुभव से भरपूर होता है.
लेकिन इस अवस्था में उसमें पहले जैसी फूर्ती नहीं रहती, उसी तरह वार्धक्य अवस्था में बृहस्पति भी सामान्य दिनों के मुकाबले कम प्रभावी माना जाता है, इसलिए मांगलिक कार्य न करने की सलाह दी जाती है. धार्मिक कार्यों, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना का महत्व इस समय और अधिक बढ़ जाता है.
न करें ये काम
- विवाह, सगाई और अन्य मांगलिक कार्यों में सुख-समृद्धि प्रभावित होती है.
- शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च अध्ययन से जुड़े मामलों में अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है.
- कोई नया काम शुरू न करें, आर्थिक उन्नति के मामलों में संघर्ष करना पड़ता है
- जिन लोगों की कुंडली में बृहस्पति पहले से कमजोर है, उन्हें इस अवधि में सोच-समझकर निर्णय लेने की सलाह दी जाती है.
नोट – हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव व्यक्ति की जन्मकुंडली में बृहस्पति की स्थिति, महादशा अंतर्दशा, गोचर और अन्य ग्रहों के संबंध पर निर्भर करता है.
15 जुलाई को गुरु अस्त
15 जुलाई को गुरु ग्रह शाम के 7 बजकर 27 मिनट पर पश्चिम दिशा में अस्त हो जाएंगे. गुरु अस्त होते हैं तो शुभ कार्य पर रोक लग जाती है. गुरु अस्त का अर्थ है गुरु का सूर्य के निकट जाना, इस समय सूर्य की तेज किरणों के कारण बृहस्पति का प्रभाव पृथ्वी से कमजोर हो जाता है. मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन. जनेऊ संस्कार, आदि का शुभ फल नहीं मिलता.
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