ट्रंप का ऐलान और सीजफायर खत्म… मिडिल ईस्ट में फिर से जंग शुरू, भारत के लिए बन सकती परेशानी

ट्रंप का ऐलान और सीजफायर खत्म… मिडिल ईस्ट में फिर से जंग शुरू, भारत के लिए बन सकती परेशानी


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  • भारत के आयात बिल, ईंधन कीमतों पर सीधा असर होगा।

West Asia Conflicts: मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच करीब चार महीने तक चले युद्ध के बाद सीजफायर होने पर क्षेत्र में शांति और वैश्विक ऊर्जा संकट से राहत मिलने की उम्मीद बन ही रही थी, कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से ईरान के साथ जंग का ऐलान कर दिया है. अमेरिका ने बुधवार (8 जुलाई, 2026) को ईरान के 90 ठिकानों पर हमला कर दिया है. ट्रंप की घोषणा और अमेरिका की कार्रवाई के बाद एक बार फिर से मिडिल ईस्ट क्षेत्र और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर वैश्विक स्तर पर टेंशन बढ़ गई है.

इस दौरान दुनिया भर के देश होर्मुज स्ट्रेट में स्वतंत्र नौवहन में मुश्किल आने, कच्चे तेल की आपूर्ति में कमी और तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी को लेकर काफी परेशान हैं. इसका संकट का असर भारत पर भी देखने को मिल सकता है. आइए आपको बताते हैं कि ट्रंप के ईरान पर नए हमले भारत को किन परेशानियों में डाल सकते हैं.

तेल-गैस की सप्लाई की टेंशन

फरवरी के अंत में शुरू अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज स्ट्रेट में नाकेबंदी कर दी गई, जिससे दुनिया की ऑयल सप्लाई चेन पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. भारत में भी तेल और गैस आपूर्ति पर संकट के बादल मंडराने लगे. हालांकि, भारत ने अपनी तेल और गैस आपूर्ति में विविधता लाकर इसके प्रभाव को कम किया, लेकिन दुनिया की 20 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट भारत में तेल और गैस आपूर्ति के लिए भी बेहद अहम है. ऐसे में अगर अमेरिका-ईरान के बीच बात और ज्यादा बिगड़ती है और होर्मुज में रुकावट आती है, तो यह भारत के लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

आयात बिल बढ़ने का टेंशन

पश्चिम एशिया में संघर्ष और तनाव के बढ़ने से भारत के लिए जो दूसरी सबसे बड़ी टेंशन हो सकती है, वो है देश के इंपोर्ट बिल यानी आयात बिल के बढ़ने का खतरा. क्योंकि भारत अपने दैनिक जरूरतों के लिए करीब 85 प्रतिशत कच्चे तेल इंपोर्ट करता है और उसे इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों के मुताबिक भुगतान करना होता है, तो ऐसे में इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम में बढ़ोत्तरी होती है, तो इसका सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल यानी आयात बिल पर देखने को मिल सकता है और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा.  

देश में पेट्रोल-डीजल के दाम की कमी होने की उम्मीद कम

मिडिल ईस्ट में जंग की शुरुआत के बाद से इसका असर वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी के रूप में देखने को मिल चुका है. भारत ने भी साल 2022 के बाद देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक के बाद एक करके कुल चार बार दाम बढ़ाए, इससे भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम में करीब 7 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई थी. हालांकि, अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम में गिरावट आई और देश में पेट्रोल-डीजल के दाम में भी कमी की उम्मीद की जाने लगी, लेकिन दोबारा जंग के ऐलान के बाद यह उम्मीद भी अब कम होती नजर आ रही है.

महंगाई बढ़ने की टेंशन

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति घटने या उसके दाम में बढ़ोत्तरी का असर अक्सर देश की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलता है. इसके अलावा, कच्चे तेल की आपूर्ति घटने या उसकी कीमत बढ़ने की वजह से देश में महंगाई का खतरा भी बढ़ जाता है. क्योंकि तेल की कीमत बढ़ने से बाजारों में सामान महंगे हो जाएंगे और लोगों की जेब पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ेगा.

शेयर बाजार से FPI तक पर असर

किसी भी तरह के वैश्विक संकट की स्थिति में इंवेस्टर्स सेफ इंवेस्टमेंट की तरफ अपना रुख करते हैं और शेयर बाजार में अचानक बिकवाली का सिलसिला शुरू हो जाता है. इससे देश के शेयर बाजार में ऐसा प्रभाव पड़ता है कि निवेशकों के लाखों-करोड़ों के निवेश पर पल भर में खतरा बढ़ जाता है और उनकी परेशानी बढ़ जाती है. 

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