हॉर्मुज संकट से रसोई और जेब दोनों पर मंडराया खतरा, जानें भारत को क्यों रहना होगा तैयार

हॉर्मुज संकट से रसोई और जेब दोनों पर मंडराया खतरा, जानें भारत को क्यों रहना होगा तैयार


अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ गया है. जून में हुआ युद्धविराम ज्यादा दिन नहीं टिक पाया और जुलाई के मध्य से हालात फिर बिगड़ने लगे. अमेरिका ने ईरानी शिपिंग पर सख्ती बढ़ा दी है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर नई शर्तें लागू कर दी हैं. इसका असर अब दुनिया के तेल बाजार में साफ दिखाई देने लगा है. ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 81-82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने इसे वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ी सप्लाई बाधाओं में से एक बताया ही था.

यह खबर भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक ऊर्जा आयात है. भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में रसोई गैस विदेशों से खरीदता है. ऐसे में हॉर्मुज में पैदा हुआ संकट कुछ ही दिनों में भारतीय परिवारों की रसोई, पेट्रोल पंप, उद्योग, शेयर बाजार और सरकारी खजाने तक असर दिखाना शुरू कर सकता है.

हॉर्मुज आखिर फिर अहम कड़ी क्यों है?

अब तो सब जानते हैं कि दुनिया के नक्शे पर हॉर्मुज भले ही एक पतला समुद्री रास्ता दिखाई देता हो लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन यहीं से गुजरती है. जैसे ही हॉर्मुज के रास्ते पर खतरा बढ़ता है, दुनिया भर के तेल बाजार में उथल-पुथल शुरू हो जाती है. हर दिन लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल यानी दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले करीब 25% तेल व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है. सिर्फ तेल ही नहीं दुनिया के करीब 20% LNG (Liquefied Natural Gas) का निर्यात भी इसी समुद्री मार्ग से होता है. 

तनाव बढ़ने के बाद कई जहाजों ने हॉर्मुज से गुजरना कम कर दिया है. कुछ दिनों में जहां 130 से ज्यादा जहाज गुजरते थे वहां ट्रैफिक घटकर सिंगल डिजिट तक पहुंचने की खबरें सामने आईं. कई तेल टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपना ट्रैकिंग सिस्टम तक बंद कर दिया. समुद्री बीमा प्रीमियम में करीब 50% की बढ़ोतरी हो चुकी है. इसका सीधा मतलब है कि तेल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना अब पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो गया है.

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है लेकिन अपनी जरूरत का 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत के कुल तेल आयात का करीब 30 से 45 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज से होकर आता है. यानी अगर यह समुद्री रास्ता लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत के सामने सिर्फ महंगे तेल की नहीं  सप्लाई की भी चुनौती खड़ी हो सकती है. ऐसे समय में भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ेगा जिसकी कीमत भी ज्यादा होगी और परिवहन में भी अधिक समय लगेगा.

पेट्रोल-डीजल पर असर कैसे पड़ेगा?

जब भी हॉर्मुज में संकट बढ़ता है सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जाती हैं. मार्च और अप्रैल 2026 में हालात बिगड़ने के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था. जुलाई में तनाव दोबारा बढ़ने के बाद कीमतें फिर 84-85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं. भारत में तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदती हैं. ऐसे में अगर तेल लगातार महंगा रहता है तो या तो सरकार को टैक्स कम करना पड़ता है या फिर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पड़ते हैं.

मई 2026 में सरकार ने चार चरणों में कुल 7.5 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाई थी. अगर हॉर्मुज संकट लंबा खिंचता है तो आगे भी कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.

रसोई गैस को सबसे बड़ा खतरा क्यों माना जा रहा है?

पेट्रोल-डीजल से भी ज्यादा गंभीर स्थिति LPG को लेकर है. भारत अपनी जरूरत की करीब 60 से 67 प्रतिशत LPG विदेशों से खरीदता है और इन आयातों का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज से होकर आता है. यानी अगर यह समुद्री रास्ता बाधित होता है तो घरेलू गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतें भी बढ़ सकती हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 तक सरकारी तेल कंपनियां हर घरेलू LPG सिलेंडर पर 500 से 700 रुपये तक का नुकसान उठा रही थीं. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें फिर बढ़ती हैं तो सरकार के सामने दो ही विकल्प होंगे या तो सब्सिडी बढ़ाई जाए या फिर सिलेंडर महंगा किया जाए.

तेल कंपनियों पर कितना दबाव बढ़ेगा?

तेल महंगा होने का सबसे बड़ा असर सरकारी तेल कंपनियों पर पड़ता है. इंडियन ऑयल (IOCL) – भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसे सरकारी उपक्रम कई बार राजनीतिक और सामाजिक कारणों से तुरंत कीमतें नहीं बढ़ा पाते.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार जून 2026 तक इन कंपनियों की कुल अंडर-रिकवरी 2.19 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी थी यानी कंपनियां लंबे समय तक लागत से कम कीमत पर ईंधन बेचती रहीं. अगर कच्चे तेल की कीमतें फिर तेजी से बढ़ती हैं तो यह वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है.

भारत का आयात बिल कैसे बढ़ेगा?

भारत तेल डॉलर में खरीदता है. इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे तेल महंगा होगा वैसे-वैसे देश को ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ेगी. आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि कच्चे तेल में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत का सालाना आयात बिल करीब 13 से 14 अरब डॉलर बढ़ा देती है. यही वजह है कि जून 2026 में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 30.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया. महंगे तेल और उर्वरकों के आयात ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई.

रुपया क्यों कमजोर पड़ता है?

जब तेल कंपनियां ज्यादा डॉलर खरीदती हैं तो विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ जाती है. मांग बढ़ने का सीधा असर रुपये पर पड़ता है और उसकी कीमत गिरने लगती है. कमजोर रुपया सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, मेडिकल उपकरण और दूसरे आयातित सामान भी महंगे कर देता है. इससे महंगाई और बढ़ती है और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी कमजोर पड़ सकता है.

महंगाई क्यों बढ़ती है?

डीजल भारत की सप्लाई चेन की रीढ़ माना जाता है. देश में ज्यादातर माल ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है और अधिकांश ट्रक डीजल पर चलते हैं. जैसे ही डीजल महंगा होता है ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ जाती है. इसका असर फल, सब्जियां, दूध, अनाज, सीमेंट, स्टील और रोजमर्रा के लगभग हर सामान पर दिखाई देता है.

जून 2026 में खुदरा महंगाई 4.38 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.32 प्रतिशत दर्ज की गई थी. अगर तेल की कीमतें फिर तेजी से बढ़ती हैं तो महंगाई पर दबाव और बढ़ सकता है.

शेयर बाजार में कौन जीतेगा कौन हारेगा?

महंगे तेल से हर कंपनी प्रभावित नहीं होती. जिन उद्योगों की लागत का बड़ा हिस्सा तेल पर निर्भर है उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान होता है. एयरलाइंस, पेंट कंपनियां, केमिकल उद्योग, टायर निर्माता और लॉजिस्टिक्स सेक्टर की लागत बढ़ जाती है जिससे उनका मुनाफा घटता है. दूसरी तरफ ONGC और Oil India जैसी कंपनियों को फायदा होता है क्योंकि वे कच्चा तेल निकालती हैं और ऊंचे दाम पर बेचती हैं.

भारत अब क्या तैयारी कर रहा है?

इस संकट ने साफ कर दिया है कि केवल रोजाना तेल खरीदकर काम नहीं चलेगा. भारत को बड़े रणनीतिक भंडार की जरूरत है. फिलहाल भारत के पास 5.33 मिलियन मीट्रिक टन का Strategic Petroleum Reserve है, जो सिर्फ 9.5 दिन की जरूरत पूरी कर सकता है. जबकि IEA करीब 90 दिन का रणनीतिक भंडार रखने की सलाह देता है.

इसीलिए सरकार अब मंगलुरु में 1.75 MMT का नया भंडार बना रही है. UAE की ADNOC के साथ 3 करोड़ बैरल तेल भंडारण का समझौता भी किया गया है. सरकार का लक्ष्य भविष्य में 12 करोड़ बैरल का रणनीतिक तेल भंडार और 30 दिन का अलग LPG रिजर्व तैयार करना है ताकि भविष्य में Hormuz जैसे संकट का असर देश पर कम से कम पड़े. अभी पहले भी भारत कुछ महीनों झेल चुका है क्योंकि हॉर्मुज हजारों किलोमीटर दूर जरूर है लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था की नब्ज उससे जुड़ी हुई है. 

यह संकट केवल तेल का नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई, रुपये, व्यापार घाटे, सरकारी वित्त और आम आदमी की जेब का भी संकट है. यही वजह है कि हर बार जब हॉर्मुज में तनाव बढ़ता है भारत को सिर्फ खबरें नहीं बल्कि अपनी पूरी आर्थिक रणनीति पर भी नजर रखनी पड़ती है. 

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