4999 का फ्लाइट टिकट 9000 में कैसे बदल जाता है? कम किराया दिखाकर कैसे जेब काटती हैं एयरलाइंस?

4999 का फ्लाइट टिकट 9000 में कैसे बदल जाता है? कम किराया दिखाकर कैसे जेब काटती हैं एयरलाइंस?


Flight Ticket Booking: फ्लाइट का टिकट बुक करते वक्त आपने भी यह महसूस किया होगा. सर्च करते समय किराया 4999 रुपए दिखता है, लेकिन पेमेंट करते-करते बिल 8 से 9 हजार पहुंच जाता है. सीट चुनने के पैसे, बैग के पैसे, खाने के पैसे और आखिर में कन्वीनियंस फीस अलग से. यह कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि एयरलाइंस और बुकिंग प्लेटफॉर्म्स का सोचा-समझा बिजनेस मॉडल है. 

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है और कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो हफ्ते के अंदर नए एविएशन नियम पेश करने का निर्देश दिया है. भले ही ये नियम अभी संसद में रखे गए हों या नहीं. 

सबसे पहले समझिए सस्ते टिकट का झांसा क्या है?

एयरलाइंस की कमाई का गणित अब सिर्फ टिकट से नहीं चलता. एयरलाइंस अपनी फ्लाइट की कुछ सीटें औसत लागत से भी कम दाम पर बेचती हैं, ताकि कम पैसे देने वाले ग्राहक आकर्षित हों. यही सस्ता किराया विज्ञापनों में दिखाया जाता है. असली कमाई बाद में होती है, जिसे इंडस्ट्री की भाषा में एंसिलरी रेवेन्यू कहते हैं.

दुनियाभर में एयरलाइंस की कुल कमाई का करीब 14 से 16 फीसदी हिस्सा अब इन्हीं अतिरिक्त चार्ज से आता है. यानी बैग, सीट, खाना, प्रायोरिटी बोर्डिंग, सब कुछ अलग से बिकता है.

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बुकिंग से बोर्डिंग तक कहां-कहां कटती है जेब?

पहला पड़ाव है सर्च और बुकिंग 

यहां आपको बेस फेयर दिखाया जाता है. पेमेंट पेज तक पहुंचते-पहुंचते टैक्स, फ्यूल चार्ज और एयरपोर्ट फीस जुड़ती जाती है. फिर ट्रैवल पोर्टल्स की कन्वीनियंस फीस अलग से लगती है जो ज्यादातर बड़े प्लेटफॉर्म्स पर प्रति यात्री करीब 149 से 499 रुपए तक होती है. यह पैसा एयरलाइन को नहीं बल्कि बुकिंग पोर्टल को जाता है.

दूसरा पड़ाव है सीट सिलेक्शन

विंडो या पसंदीदा सीट चुनने के लिए आमतौर पर 300 से 800 रुपए प्रति फ्लाइट देने पड़ते हैं और एक्स्ट्रा लेगरूम वाली सीटों के दाम इससे कहीं ज्यादा होते हैं. परिवार साथ बैठना चाहे तो अक्सर हर सदस्य के लिए अलग पेमेंट करनी पड़ती है.

तीसरा पड़ाव है बैगेज

यह इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा विवाद है. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि सभी निजी एयरलाइंस ने बिना किसी ठोस वजह के इकोनॉमी क्लास यात्रियों का फ्री चेक-इन बैगेज 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दिया यानी जो सुविधा पहले टिकट में शामिल थी, उसे कमाई का नया जरिया बना दिया गया. तय सीमा से ज्यादा वजन होने पर घरेलू उड़ानों में 400 से 750 रुपए प्रति किलो तक वसूले जाते हैं

चौथा पड़ाव है कैंसिलेशन और बदलाव

टिकट कैंसिल करने पर आमतौर पर 2500 से 3500 रुपए तक की फीस कट जाती है, जो कई बार सस्ते टिकट की पूरी कीमत के बराबर होती है.

डार्क पैटर्न यानी स्क्रीन पर छिपा जाल

सरकार खुद मानती है कि बुकिंग प्लेटफॉर्म्स पर यात्रियों को भ्रमित करने वाले तरीके इस्तेमाल होते हैं. उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण CCPA ने नवंबर 2023 में 13 तरह के डार्क पैटर्न पर रोक लगाई थी, जिनमें फॉल्स अर्जेंसी, बास्केट स्नीकिंग, कन्फर्म शेमिंग, ड्रिप प्राइसिंग जैसे तरीके शामिल हैं.

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आसान भाषा में समझें तो फॉल्स अर्जेंसी का मतलब है स्क्रीन पर बार-बार ‘सिर्फ 2 सीटें बचीं’ जैसा दबाव दिखाना. बास्केट स्नीकिंग का मतलब है आपकी मर्जी के बिना इंश्योरेंस या मील जैसी चीज कार्ट में जोड़ देना और ड्रिप प्राइसिंग का मतलब है असली कीमत आखिरी पेमेंट स्टेप पर जाकर खोलना.

यह समस्या कितनी बड़ी है इसका अंदाजा एक सर्वे से लगता है. LocalCircles के सर्वे में 62 फीसदी उपभोक्ताओं ने कहा कि उन्हें फ्लाइट बुकिंग में ऐसे हिडन चार्ज का सामना बार-बार करना पड़ा जो पहले से नहीं बताए गए थे, जबकि 40 फीसदी ने कहा कि उनकी सहमति के बिना कोई सर्विस उनके कार्ट में जोड़ दी गई.

दिसंबर 2025 में इंडिगो के बड़े संकट के दौरान जब हफ्तेभर में 5000 से ज्यादा उड़ानें रद्द हुईं, तब ऐसी शिकायतें और बढ़ गईं. एयरलाइन ने फ्री कैंसिलेशन और पूरे रिफंड का वादा किया था, लेकिन कई यात्रियों ने बताया कि ऐप पर कैंसिल का विकल्प ही काम नहीं कर रहा था और सिर्फ तारीख बदलने का ऑप्शन दिख रहा था.

डायनेमिक प्राइसिंग, यानी एक ही सीट के कई दाम

अब सवाल यह कि आखिर किराया घटता-बढ़ता कैसे है. दरअसल 1994 में एयर कॉरपोरेशन एक्ट खत्म होने के बाद से भारत में हवाई किराया पूरी तरह बाजार तय करता है. सरकार किराया न तय करती है और न नियंत्रित करती है. एयरलाइंस कई प्राइस लेवल यानी बकेट्स में टिकट बेचती हैं जिन्हें RBD कहा जाता है.

सबसे सस्ती बकेट पहले बिकती है और जैसे-जैसे सीटें भरती हैं, दाम अगली महंगी बकेट में चला जाता है. यही वजह है कि त्योहार या लंबे वीकेंड पर किराया कई गुना हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद इसका उदाहरण दिया. बेंच ने कहा कि एक ही दिन, एक ही रूट पर एक एयरलाइन इकोनॉमी का 8000 रुपए ले रही है तो दूसरी 18000 रुपए.

सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन

यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन की जनहित याचिका से शुरू हुआ. नवंबर में कोर्ट ने केंद्र और अन्य पक्षों से जवाब मांगा था. याचिका में एक ऐसे मजबूत और स्वतंत्र रेगुलेटर की मांग की गई है, जो किराए में पारदर्शिता और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. कोर्ट किराए में बेतहाशा बढ़ोतरी को ‘शोषण’ तक कह चुका है.

याचिका का सबसे तीखा तर्क यह है कि फिलहाल किसी भी अथॉरिटी के पास किराए या अतिरिक्त फीस की समीक्षा करने या उन पर सीमा लगाने की ताकत नहीं है, जिससे एयरलाइंस हिडन चार्ज और अनिश्चित प्राइसिंग के जरिए उपभोक्ताओं का शोषण कर पाती हैं.

अब जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र से पूछा कि नए एविएशन नियम अधिसूचित करने में देरी क्यों हो रही है. केंद्र की ओर से बताया गया कि भारतीय वायुयान अधिनियम 2024 के तहत ड्राफ्ट नियम फाइनल हो चुके हैं और अभी उनका अनुवाद चल रहा है, जिसके बाद उन्हें 30 दिन के लिए संसद के दोनों सदनों में रखा जाएगा.

सरकार ने बताया कि ये नियम 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले मॉनसून सत्र में संसद में रखे जाएंगे, लेकिन कोर्ट ने इंतजार करने से मना कर दिया और निर्देश दिया कि नियमों की सीलबंद कॉपी दो हफ्ते के भीतर कोर्ट में जमा की जाए चाहे वे संसद में रखे गए हों या नहीं. अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी.

याचिकाकर्ता के वकील ने सुनवाई में कहा कि एयरलाइंस बहुत ताकतवर हैं और सिर्फ नौकरशाही ढांचा नहीं बल्कि एक स्वतंत्र रेगुलेटर चाहिए.

आगे क्या बदल सकता है?

अब सबकी नजर भारतीय वायुयान अधिनियम 2024 के नियमों पर है. अगर इनमें किराए और अतिरिक्त चार्ज की निगरानी का ठोस तंत्र बना तो यह भारतीय एविएशन में 1994 के बाद का सबसे बड़ा बदलाव होगा तब तक यात्रियों के लिए सबक साफ है. बुकिंग के आखिरी पेज तक हर चार्ज ध्यान से पढ़ें, कार्ट में अपने आप जुड़ी चीजें हटाएं और याद रखें कि स्क्रीन पर दिखने वाला सबसे सस्ता दाम अक्सर पूरी कहानी नहीं होता.



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